Thursday, July 24, 2014

नभ्

                                               नभ……

नभ अपनी गागर लिए ,
आस की बूंद गिराता चला ,
सूखी आँखो को नम ,
हरयाली फैलाता चला ,

घन -घटाओ की गर्ज्जना ,
दिल दहलाता चला ,
भू की भूख की तड़प ,
हारिल की प्यास बुझाता चला ,

पोखर के किनारे ,
दादुर को मन तक भीगता चला ,
 नभ अपनी गागर लिए ,
आस की  बूंद गिराता चला

Saturday, July 12, 2014

काश

                                     काश.…। 

काश यह कलम तलवार होती ,
तो हम भी हाथ लाल कर लेते ,
 कुर्बान कर देते ,
 हिंसक सरो को ,
कलम काश तलवार होती। 

पत्थर से ह्यद को ,
मोम सा काट देते ,
खौफ़ के हैवान की ,
भुजाएं उखाड़ देते ,
हम भी हाथ लाल कर लेते।
 
इज्जत के भेडियो को ,
जड़ मूल से उखाड़ देते ,
खौफ़ के शहर से 
खौफ़ को मिटा देते ,
काश यह कलम तलवार होती।
 

Friday, June 13, 2014

हैवानियत

                                       हैवानियत

हैवानियत का शहर 
यह जहन्नुम का है  यह आलम 

भेड़ियो  से भरा ,
शायद इंन्सा कोई न बचा ,
 
मासूम सी कितनी जिंदगिया,
लटकते फंदो में सिमट गई ,
खून के आशू ,अपनों का गम,
राजनीत की भेंट चढ़ गई ,

हैवानियत का शहर में ,
हैवानियत के दो केश और बढ़ गए ,
दिन गुजरा सब सो गए 
भेड़िये शिकार कर,
फिर फरार हो गए ,

Thursday, June 12, 2014

गंगा

                                              गंगा 

कल-कल  का स्वर करती 
पतित पावनी जल धारा 
संस्कृती की जन्म दायनी 
अमृत सी जल धरा 

दूध सी गोमुख से निकली 
पापो को जो धोते चलती 
धरती की प्यास  बुझाती
फिर सागर से मिल जाती 

आज छिड़ी जंग यह कैसी 
मानव चला माँ मिटाने 
स्वर्ग से आई जल धारा को 
कर्मो से काला पानी बनाने ,

भारत को जिसने कृषि प्रधान बनाया 
सूखे में फसलो को लहराया 
आज स्वम् लड़ रही है ,देखो 
अब बस रोको गंगा मर रही है , देखो

Wednesday, May 21, 2014

प्याज के आँशू

                                    प्याज के आँशू 

 दिखावे के ,बहकावे के,
 करुणा झलकाने के, 
 आँखे  नम करने के, 

 बहाने अपनाने में,
प्याज़ के भूमिका ,
आँशू  बहाने में ,

 वय्था कथा बतलाने में,
 प्रपुल्लित हद्रय से ,
 आँशू  बहाने में ,

 खुशियो की लालिमा में ,
 दुःख झलकाने में ,
 प्याज के आँशू बहाने में ,

Sunday, May 18, 2014

रोटी का टुकड़ा

                                  रोटी का टुकड़ा 

 तड़पती धूप में ,
 बूँद की चाहत लिए। 
 सूखे आँशु ,
 पेट की भूख़ ने किए। 
 धिक् -धिक्कारता समाज ,
 ठूठ सा ह्रदय लिए। 
 मुर्झाया बचपन ,
 रोटी का टुकड़ा लिए। 

  दिलासे  का भोजन ,
  झूठे पत्तल लिए। 
  कड़काड़ती धूप मे,
  हाथ पसारे हुए। 
  रोटी की आस में ,
  टकटक निहारें हुए। 
  भूखे पेट ,
  दुआए  माँगते हुए। 
  मुर्झाया बचपन ,
  रोटी का टुकड़ा लिए। 
    
       
             

Wednesday, April 30, 2014

मतदान

                              मतदान 

अपने  मत का करो मान ,
आ गया  मतदान ,
अब चुनना है , हमको यारो ,
अब भारत की  दशा सुधारो ,
 
अब सोचो नहीं ,
करो एक काम ,
अपने अधिकार का ,
करो सम्मान ,

मत जाना वादो पर यारो ,,
मोहर अब काम पर मरो ,
बहुत हुआ अब देखो यारो ,
अब भारत की  दशा सुधारो ,