आज फिर आग जलाओ
अपने हौसले को फिर जगाओ
एक मसाल जलाकर
सब फिर जीत जाओ
माँ के चरणों को छु कर
लक्ष्य की तरफ दौड़ जाओ
आज फिर एक लौ जलाओ
साथ मिलकर फिर दौड़ जाओ
सपनो के जहाँ को
आज सच कर दिखाओ
फिर एक लौ जलाओ
(आशु)
आज फिर आग जलाओ
अपने हौसले को फिर जगाओ
एक मसाल जलाकर
सब फिर जीत जाओ
माँ के चरणों को छु कर
लक्ष्य की तरफ दौड़ जाओ
आज फिर एक लौ जलाओ
साथ मिलकर फिर दौड़ जाओ
सपनो के जहाँ को
आज सच कर दिखाओ
फिर एक लौ जलाओ
(आशु)
उम्मीदों के सहारे हम जिये जा रहे
कुछ घूँट है कड़वे
कुछ दबी हुए यादें
पर हम सब सहे जा रहे
निकलता हुआ देखता हूँ
चाँद आज कल
पर यह अमावस्या की छाया
क्यों बढ़ी जा रही
उम्मीदों के क़ारवे को लेकर
हम जिये जा रहे
कुछ स्वप्न टूटे कुछ लोग छूटे
हम उम्मीदों के सहारे जिए जा रहे, (आशु)
आज रात्रि में मन
एक अज़ीब कोशिश कर रहा
बार बार चाँद को हाथो में भर रहा
चंचल मन न मान रहा
न हार रहा
कभी कभी नभ्चर की छाया
चाँद में पड़ जाती है
कभी मेघ भी गागर लेकर आ जाते है
पर मन नहीं मान रहा
हाथो में चाँद को भर रहा
बचपन की कुछ झलकियां
आज अतीत में ले जा रहा
माँ की लोरियां नानी की कहानियाँ
आज फिर सुना रहा
आज चाँद को मन पकड़ रहा
जब बढ़ रहे थे
कदम हमारे
सांसे रुक रही थी
दुश्मनों की
हर तरफ हमारा
खौफ़ था
कल तक जो दुश्मन
बेख़ौफ़ था
आज स्वप्न में भी
नहीं दिख रहा
माँ के चरणों को छूकर
हम जब निकले थे
सरहद में जाकर
फिर जा मिले थे
क्यों करता है नाज़
क़िस्मत ने जो दिया आज़
क़िस्मत को हमने भी देखा है
पानी बरसते में
दिये को जलते देखा है
तू पत्थर दिल इंसा
तू मोम की ताक़त क्या जाने
जो रो देती एक बाती के जलने से
यह पत्थर दिल इंसा
माँ खुद पसीनें से तरबतर
पर मुझ पर पंखा डुलाते देखा है
खुद जग कर
मुझको सुलाता देखा है
खुद भूखा रह कर
मुझको खिलाते देखा है
पूँछने पर,पेट भरे होने का
बहाना करते देखा है।
मेरे दर्द में होने पर
माँ को रोते देखा है
मेरी सफलताओ में
उनकी आँखो को चमकते देखा है
मेरे घर देर आने पर
उनकी आँखो में इंतज़ार देखा है
मेरे न खाने पर
रात को जगाकर खिलते देखा है