Sunday, May 29, 2016

सौ कोस ( भाग 1)

गरीबी की मार झेल रहा रामू और उसका भाई बिरजू , साम को खेत में ऊपर बादल निहारते हुए सोच रहे थे इस बार भी बारिस के आसार कम ही है , घर बार कैसे चलेगा और बच्चे जब रोटी के लिए रोते है तो रामू की आँखे भर आती है , पर क्या किया जाए यह तो प्रकृति की मार है  , जिससे सब घिरे हुए है ,  बिरजू गाँव के एक सेठ के घर में काम करता था बिल्कुल मस्त मौला आदमी कुछ घमंडी , उसको किसी चीज की चिंता नहीं , बस अपने से मतलब रखने वाला  ,पर कभी कभी अपने भाई और घर की स्थित देखकर चिंतित हो जाता था , घर पर पुरानी खपरैल , कुछ घास फूंस लगी हुई पर समय की मार झेलकर वो भी अस्त वस्त है , दरवाजे की जगह  एक पुराना पर्दा पड़ा था , अगर कोई उसे खोल देता तो गरीबी की नग्नता को साफ़ देख सकता था , जिस तरह नारी की लाज साड़ी बचाती है उसी तरह पर्दा घर की लाज को ढके पड़ा था ,   पर अपने स्वभाव के कारण बिरजु  कुछ समय में अपनी मनोदशा मे  वापस आ जाता था और साम को सेठ से पैसा लेकर  मदिरालय में दारू पीता और घर आकर सो जाता है, उसे न समाज की फ़िक्र न घर की , कौन रो रहा है कौन भूखा है बस अपने बिस्तर उठाता और बाहर आ कर सो जाता , इसके विपरीत रामू सारी रात चिंतित और पत्नी से बाते करता रहता की अब क्या होगा कल खाना किस तरह बनेगा ,इसकी योजना बनाते बनाते कब सो जाते पता नही चलता ,  सुबह रामू सबसे पहले उठ कर खेत जाकर कुछ खाने का इंतजाम करता था और कभी कभी दुसरो के खेत से भी कुछ सब्जिया तोड़ लेता था , पेट क्या न कराये , पल भर में चोर बना देता है एक सीधे इंसान को ,  बिरजू इसके विपरीत सोता और उठकर नित्यक्रिया कर काम पर चला जाता , और सेठ की जी हुजूरी कर कुछ मुनाफा भी कमा लेता , कभी कभी साम को बच्चों के लिए कुछ ले आता , पर रोजाना उसके मिलने का एक ही स्थान होता है मदिरालय , ठेका भी  सेठ का कभी पैसे दिए नहीं दिए सब चलता था , कच्ची शराब पीकर मस्त होकर घर आता , खाने को मिलता तो सही नहीं तो सो जाता ,  समय बीतता गया , सुखा के कारण पूरा गाँव भुखमरी झेल रहा था , पर अब रामू की स्थिति और दयनीय हो  गयी थी , कभी रोटी मिलती कभी खाली पेट , बच्चों को भी माँ कब तक पानी में गुड़ घोल कर दूध कह कर पिलाती ,पर  आँशुओ को आँखो से निकलने से नहीं रोक पाती ,  बच्चे भी कभी कभी कह देते माँ रो मत यह दूध बहुत अच्छा है , तब सीने से अपने बच्चे को लगा लेती ,   यह सब देख कर रामू भी दुःखी हो जाता की वह कुछ कर नहीं पा रहा है , बस अपने गरीबी के दिन गिन रहा था , कभी कभी सोचता की पूर्व जन्म के कर्म है शायद , गाँव में अकाल , एक एक रोटी के टुकड़े के लिए लड़ते बच्चे , यह देख कर मन विचलित हो जाता था पर वो क्या कर सकता है ,जो स्वम् पीड़ित है , कभी कभी मन करता था की इस जीवन को समाप्त कर लू , पर आत्महत्या वो सिर्फ मेरी नहीं होगी पुरे मेरे परिवार की होगी यह सोच कर रामू सांत हो जाता था ,इधर सेठ भी जिन जिन लोगो को सूत में कर्ज दिया था उनके घरौंदों को तोड़ने से भी पीछे नहीं हट रहे है , और जब जब बिरजु उसूली करने जाता लौट कर आकर वही नित्य क्रिया में लग जाता ,कच्ची शराब पीकर सो जाना , उसका जीवन इस तरह ही चल रहा था, एक दिन रत्रि में गाँव के तीन लोगो की अचानक मृतु ने पुरे गाँव को भयभीत कर दिया , बाद में पता चला की  यह सब सेठ के यहाँ से शराब पीकर आये थे इस कारण इनकी मृतु हो गयी है , सारे गाँव के लोग रामू की अगवाई में सेठ के घर जाकर  हँगामा करते है , सेठ उनको सांत कराते हुए कहते है क्या चाहिये , हम सब सही कर देंगे सांत रहे ,  सब चले जाते है  ,क्योंकि उन लोगो में प्रमुख रामू था इसलिये सेठ ने बिरजू को बुलाया और कहा की अपने भाई को कल मेरे घर लाना , बिरजू ने वही किया अगले दिन वो रामू को लेकर सेठ के घर पंहुचा , सेठ ने रामू से कहा की तुम गाँव वालो का साथ मत दो , इसके बदले में हम तुम्हे जितनी कहोगे उतनी जमीन देगे , रामू ने कुछ  सोचा फिर अपने बच्चों और पत्नी के विषय में सोचने लगा की हमारे सारे कष्ट समाप्त हो जायेगे , कुछ समय के लिए स्वर्थी हो गया था और समाजवादी से पारीवारवादी बन गया था , रामू मान गया , सेठ उसे अपने खेतो की तरफ ले गया और कहा की यह सारी ज़मीन मेरी है तुम चाहो जिनती मन हो  ले लो , और कहा की कल तुम जितनी ज़मीन में हल चला लोगे वो तुम्हारी होगी , यह कह कर सेठ चला गया , अब रामू को चैन नहीं पड़ रहा था रात में भोजन भी नहीं किया , सोचा की कल कम से कम सौ कोस हल चलाऊँगा सोचते सोचते सारी रात जगता रहा , की अब सब गम दूर हो जायेगे  हम अमीर हो जाएंगे , दिन आया सब तैयारी रामू करने लगा एक बैल वो भी कमजोर जब इंसान भूखे है , जानवर को कौन देखे , रामू ने  बैल को पानी पिलाया और सेठ को खेतो की ओर ले गया  वाह सेठ का मुनीम और रामू की पत्नी बच्चे सब आ गए , कमजोर बैल और रामू भी पर इस समय न जाने कहाँ से इच्छा शक्ति रामू में आ गयी थी , रामू बलवान खुद को प्रतीत कर रहा था , रामू खेतो में हल चलाना प्रारंभ करता है ,  कुछ देर चलने के बाद बैल कमजोरी के कारण रुक जाता है , सोचता है अभी कोस भर भी नहीं हुआ  और बैल रुक गया , और वो चाबुक उठाता है बैल को मारता है बैल भी अपनी जन्दगी के लिये चलता है और  चलता रहता है  अब रामू को क्रूरता के लक्षण दिखने लगे थे , लगातार मार खाने और चलने से अब बैल भी चलने में असमर्थ हो रहा था , सर पर घोर धुप ,  अब रामू एक ही बात सोच रहा था की सौ कोस कम से कम , पर अभी तो तीन कोस भी नहीं हुए और घमंड और क्रूरता से भर कर बैल को मरता रहा , और वो कुछ कदम चलता और रुक जाता , अंत में बैल  कुछ कदम चल कर गिर जाता है , तब रामू समझ जाता ही की अब यह नही उठ पायेगा, और बैल से हल निकालकर खुद हल कंधे में रख लेता है और बैल को तड़पते मरता छोड़ कर आगे बढ़ जाता है काफी चलने के बाद , पसीने से तरबतर हो जाता है और थक कर बैठ जाता है ,पर मन में लालच भी अब आ गया की कुछ जमीन और जोत लु मेरी हो जायेगी , और उठ कर आगे बढ़ गया ,आज रामू में हर परिवर्तन आया , कई रूप सामने आये ,  रामू काफी आगे निकल आने के बाद वापस जाने के लिए सोचने लगा  और हल उठा कर चल दिया चलता रहा और चलता रहा जब तक उसके कदमो ने उसका साथ दिया और एक जगह बैठ गया अब एक कदम चलने में समर्थ नही था अब उसकी स्थिति उस बैल के सामान थी , रामू सोचने लगा की क्यों वो इतनी दूर आ गया अगर वापस नहीं गया तो कुछ नहीं मिलेगा , अब हताशा भी साफ़ साफ़ झलक रही थी , बार बार उठ कर चलता और रुक जाता , रामू का शारीर अपनी कार्य करने की सीमा से परे जा चूका था ,  यहाँ दूसरी तरफ  सूर्य की लालिमा की स्थित में आने लगा था और धीमे-धीमे तिमिर से सूर्य धरा की ओर लालिमा लिए बढ़ने लगा था  रामू को अब समय की सोच ने घेर लिया की वह पहुँच पायेगा की नहीं ,  उसने हल को छोड़ दिया और अपने गाँव की तरफ दौड़ पड़ा , रुकता फिर दौड़ता  शारीर में अब चलने की छमता समाप्त हो गयी थी रामू कुछ दूर चला और गिर गया , तब उसने देखा की  उसका परिवार दो बीघे बाद खड़ा इंतजार कर रहा है अब उसकी आँखो में चमक को साफ़ साफ़ देखा जा सकता था , वो उठा और तेजी से चलने लगा और अपनी पत्नी के पास पहुँच कर गिर गया मुँह से ख़ून आने लगा और  उसकी आँखे बंद होने लगी थी और कुछ समय बाद उसकी सांसे थम गयी और परिवार ने सब कुछ खो दिया बच्चे अनाथ और पत्नी बेवा हो गयी , अब सेठ ने भी बिरजू का साथ छोड़ दिया और गाँव वाले भी नराज़ थे अब स्थित और बत्तर हो गयी थी, बिरजू गाँव छोड़ कर चला जाता है और रामू की पत्नी बच्चों को लेकर अपनी झोपडी का पर्दा हटाती और अंदर चली जाती शायद कभी बाहर न आने के लिये ।

Monday, May 2, 2016

कलम के सिपाही

डरता हूँ, सच लिखने से
कलम जला दी न जाये
डरता हूँ सच कहने से
कही सांसे थाम न दी जाये,

पर हम नहीं है रुकनेवाले
कितनी कलमें तोड़ेंगे
कब तक सच से मुँह मोड़ेंगे
हम भी फौलादी हौसले वाले
सीने की आग को
कोरे पन्नों में लिखने वाले

सच को जो कर रहे प्रताड़ित
पराजित न कर पाएंगे
भले जीत कर चल रहे अभी
पर मेरे हौसलें से न लड़ पाएंगे,

Tuesday, April 12, 2016

कोर कल्पना (हास्य व्यंग)

कोई भी कवि कल्पना के बिना अपूर्ण है, कवि ही कल्पना है और कल्पनाओं के सागर का निर्माता और समाज को उस आँखो से देखने की अद्भुत क्षमता कवि में ही है , आज हम भी ऐसा ही सोच रहे है , आप भी सोचो ,
आधुनिक युग में मनुष्य कितना आलसी हो गया है हम जानते है , सब्जियों को लेने तक हम वाहन का उपयोग करते है ,
यदि हमे कुदरत में कुछ विशेष जीवों जैसे अंग दिए होते तो क्या होता सोचा है कभी आप ने ,नही न आज सोचिये
यदि हम लोगो के पूँछ होती तो क्या होता है , हम टीवी का रिमोट हाथो से नहीं दबाते  , यह दूर रखे रिमोट को बस अपनी पूँछ से ही उठाते ,  पानी का ग्लास बस पूँछ से लपेटे और पी लेते , कितनी आसान होती यह जिंदगी , गाडी चलाते समय सईद पूँछ से ही लेते , उसको भी सजाने के लिए घण्टियाँ बाँधते , हाथो को कुछ हद तक आराम , शायद हम टाइप भी पूँछ से ही कर रहे होते , माँ भी जब गुस्सा होती तो घुमा के एक पूँछ मारती और हम लोग सीधे हो जाते , जब जब मन ललचाता पूँछ हिलाते , बचपन में अपनी पूँछ की कसमे भी खाते , जब डर जाते पूँछ दबा लेते , टीवी में ऐड भी आता की क्या आप की पूँछ छोटी है तो मात्र यह लेप बीस दिन लगाये पूँछ को हस्ट-पुस्त बनाये ,क्या जीवन होता अकल्पनीय अद्भुत । समाज भी अलग तरह से बटा होता ,विवाह में गठबंधन की जगह पूँछ बन्धन होता , पंडित जी अपनी पूँछ से आशिर्वाद देते , जरा सोचिये आप क्या करते ।

Friday, April 8, 2016

लेखन कला और विषमतायें

इस आधुनिक युग में कलम के सिपाहियो की कमी नहीं है
बस कमी है ह्दय को झिझकोर् देने वाले लेख की जो आप को पढ़ने वाले के मस्तिष्क के अंदर विचार धाराओं की एक बिजली प्रवाहित कर दे और पाठक मानसिक रूप  से आप से जुड़ जाए ,और उनकी यह  इच्छा प्रबल हो जाए की वह आप के विचरो से सहमत है , सामजिक सोच अच्छा का होना  काम नहीं आता ना ही किसी समस्या को उठाना , जब तक आप के पास उसका पूर्ण रूप से समाधान न पता हो , आज के समय में लोगों के पास चिंतन का समय नहीं है उन्हें जो चाहिए अर्थ सहित चाहिए , समाज में बदलाओ आप का लेख नहीं ला सकता पर दिशा जरूर दिखा सकता है
जब तक पाठक आप से भावत्मक रूप से नहीं जुड़ेंगे तब तक उसे क्या चाहिए यह नहीं पता चलेगा , आज के सामज में अनेक तर्क वादी उपस्थित है तो आप के विचारों में बाधा उत्प्न जरूर करेगे उनको भी आप अपने विचारो के अधीन कर सकते है ,समस्याओं और उसके समाधान पर आधारित लेख समाजिक ढाँचा को मजबूत करने का काम करता है और लेखक के अंदर के अनेक  विचरो के उफान को सांत करने का कार्य भी करता है ,अगर आप नहीं लिखते है और मानवता के विषय में चिंतन करते है तो आप एक लेखक बन सकते है बस आप अपने विचारो को इक्कठा कर के कोरे पन्ने में उतार दे यह मत सोचे की क्या गलत है क्या सही है क्योंकि आज के युवा लेखक सामाज की कुरीतियों पर ही विशेष ध्यान देते है अच्छाई पर नहीं ,यही कारण है की पढ़ने वाला पाठक समाज की धूमिल छवि अपने मन मस्तिष्क में बना लेता है , और उसके अंदर विरोधाभास उत्प्न हो  जाता है और इस कारण वह भी समाज की स्थिति  का सही पता नहीं लगा पता है , आप जो भी लिखे वह पाठक को समाज हित में कार्य के लिए प्रेरित करे, इस पर विशेष ध्यान देना चाहिए आज का समाज उतना कुरीतियों से नहीं घिरा है  जितना किसी समय था आज काफी हद तक निज़ात मिल चुका है बस जो बची हुई समस्याएं है उनका निवारण करने के लिए बस लोगो को प्रेरित करने के लिए कलम चलानी है और उसी पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है और एक किसी भी लेख के लिए शोध भी एक अहम भूमिका निभाता है ,और लेखक की विचार धारा शब्दों का चयन भी  एक मुख्य तथ्य है ,आप का लेख आज की भाषी प्रवत्ति के साथ साथ लेखन के लिये आवश्यक पूर्व निर्धारित शब्दों का उपयोग भी आवश्यक है तथा आप की रचना में आप द्वारा कुछ नय शब्दों का आविष्कार होना लाजमी है। यही नय शब्दों के जन्म का प्रमाण है कभी कभी यह उत्प्न नय शब्द पुरे लेख को एक दिशा प्रदान कर देते है  और लेखक के विचरो को खोल कर पाठक के सामने रख देते है, पाठक अपनी राय दे सके इसकी स्वतन्त्रा भी पाठक के पास होनी चाहिये  तभी कोई लेख एक प्रभावशाली रचना  हो सकती है , जो ह्दय को झिझकोर दे और आप के अंदर की सभी संवेदनाओं को जागृत कर दे , जरूरी नहीं केवल वह ही लिख सकता है , जो किसी संस्थान से जुड़ा हो यह उसका यह कार्य हो , लेखक हर वो आदमी हो सकता है , जिसकी सोच समाज हिती, यह विरोधाभाषी हो , लेखन वह कला है जो एक सुसूक्त पड़े हुए मनुष्य में अपनी लेखनी से शब्दों से ऊर्जा का संचार कर दे ,  यह ही लेखक की विशेषता होती है , वो यह कलम के उपयोग से सोच बदलने के साथ साथ समाज के नए नए पहलुओं को खोल सकता है , लिखता तो हर व्यक्ति है , हर सम्पादक है, पर कोई दूसरे लेखों के वाक्यों को चुराता है , कोई पूरा ही उतार देता है ,  जरूरी नहीं  की एक  सम्पादक ही महान लेखक हो सकता है ,  यह विचारक ,  जैसा की लोग मानते है , कोई छोटा सा सवांददाता , यह समाजसेवी , यह आम व्यक्ति  के अंदर वो गुण हो सकते है , जिसकी कलम समाज में जम जाये ।

Wednesday, April 6, 2016

मसाल

आज फिर आग जलाओ
अपने हौसले को फिर जगाओ
एक मसाल जलाकर
सब फिर जीत जाओ
माँ के चरणों को छु कर
लक्ष्य की तरफ दौड़ जाओ

आज फिर एक लौ जलाओ
साथ मिलकर फिर दौड़ जाओ
सपनो के जहाँ को
आज सच कर दिखाओ
फिर एक लौ जलाओ
(आशु)

Sunday, January 3, 2016

Friday, October 16, 2015

उम्मीद का कारवाँ

उम्मीदों के सहारे हम जिये जा रहे
कुछ घूँट है कड़वे
कुछ दबी हुए यादें
पर हम सब सहे जा रहे

निकलता हुआ देखता हूँ
चाँद आज कल
पर यह अमावस्या की छाया
क्यों बढ़ी जा रही

उम्मीदों के क़ारवे को लेकर
हम जिये जा रहे
कुछ स्वप्न टूटे कुछ लोग छूटे
हम उम्मीदों के सहारे  जिए जा रहे, (आशु)