Thursday, February 5, 2015

ख्वाइश

देखा है कितनो ने मंजिलो की,
दौड़ में अपनों को छोड़ दिया,
हमसे भी कहते है,
जाओ कुछ कर दिखाओ,
अपनों से थोड़ा दूर हो जाओ,
नहीं तो कुछ नहीं कर पाओगें,
जहाँ जो वहाँ पर रह जाओगे,

अगर अपनों को खोकर,
जहाँ पा लिया तो क्या फायदा,
दो मृदु जल के कुँए खोकर,
समंदर पा लिया तो क्या फायदा,

हम भी उठेगें
बस अभी ठानी नहीं है,
इसका मतलब यह नहीं ,
की हमारे सपनों
की कोई कहानी नही है,

पढ़ लेना जब इतिहास के,
पन्नों में लिखी जाये क़ामयाबी मेरी,
देख लेना जब तुंम्हारे ,
बच्चों के सेल्बेस मे आये  कहानी मेरी,(आशु)

Monday, January 26, 2015

मौन

मौन

न शब्द लिखा
न अर्थ लिखा
मै मौन रहा,
लेखनी भी मौन रही,

शहीद हुए है जो रण मे,
उनको श्रद्धा ही लिखता रहा,
न अश्रु भरे हमने आँखो मे,
न ह्दय भरा हमने करुणा सें,

बस गर्व हुआ ,
मुझे उन माओ  पर,
जिसने शहीदो कों जन्म दिया,

गर्व हुआ,
अपने भारत पर,
जहाँ शहीदों ने,
जन्म् लिया,

न शब्द लिखा
न अर्थ लिखा

बस घृणा हुई,
मुझे अपने से,
मै देश के काम ,
ना आ पाया,

मै मौन रहा,
मै मौन रहा

Sunday, December 28, 2014

पाखी..


               पाखी....






एक पाखी,
मेरी साकी बन गयी,
पंख फैलाकर नभ् मे गुम गयी,
काश हम भी ,पाखी होते,
पंख फैलाते,गुम हो जाते ।

न बंधन कोई ,
न चिंतन कोई,
इस नव जीवन की,
तरणी मे,
मै शून्य यात्रा कर लेता,

मै नाहर बन,
गिरराज वक्ष मे,
अपना गेह बना लेता,
मै मेघ तुरंग बन,
अंचला की,
सात प्रकिमा कर लेता,

अपनी अभीष्ट पूर्ति कर,
हाला का भोग लगा लेता,
इस नव जीवन के,
अतुल्य मधु को,
आज यहाँ पर चख लेता,

अपने लोचन मे ,
लोक बसा ,
देवलोक यात्रा कर लेता,
पीर ,मद सब त्याग,
हिमकर मे धाम बसा लेता,

नीलकंठ के चरणों मे,
हलाहल भोग लगा देता,
मेघ मतंग बन,
आज सूर्य को मै ढक लेता,
चपला को वाहन बना
सुरपति से आज मै मिल लेता,

पंख फैलता ,
फिर उड़ जाता,
अर्श के उस अनंत तिमिर मे,

Tuesday, October 21, 2014

दीपावली

                                        ,,,,,,,,,,,,,दीपावली,,,,,,,,,,,
दीये बिन कैसी  दीवाली ,
अब नहीं वैसी दीवाली ,
आधुनिक लईटो में अब दीवाली ,
दीपावली बन गयी दीवाली ,
बिन दीये कैसी  दीवाली ,
   
कुम्हार से पूछों  कैसी  दीवाली ,
 अब नहीं वैसी दीवाली,
दीयो की खेप लौ के लिए तरस रही 
जल बिन मीन सी दिख रही ,
अब नहीं वैसी दीवाली
            दीये बिन कैसी  दीवाली ,


Friday, October 3, 2014

नया सवेरा

                                 नया सवेरा…

आज कुछ नया हुआ ,
पर सूर्य वही चाँद वही ,
आज कुछ नया हुआ ,
चपको सा पर्यावरण बचा ,
 आज कुछ नया कर,
सपनो का हिन्दुस्तान बना ,
हटा दो  धूल '
जो पथ को धुमिल करे ,
दिन को दिवाली बना ,
सपत नही अब आग जला ,
सपनो का हिन्दुस्तान बना ,

Friday, September 12, 2014

सैलाब

                                          सैलाब …  

सैलाबे  जन्नते  , डूबता शहर 
हाहाकार करती  प्रजा ,
जन्नत भी आज ,
नर्क सा सजा ,
 सैलाब मे पानी को तरसते ,
पानी में अंतिम सांस लेते लोग, 
 डूबता शहर या जन्नते सैलाब ,




रोआंसी आँखो से ,
अपनों को तलासते ,
सैलाब मे बहते घरौदो को देखते ,
आस की आस में,
 टक -टक निहारते लोग ,
 जन्नते सैलाब,सैलाबे  जन्नते 
   

Sunday, August 24, 2014

मधुवन की मधुशाला

                                        मधुवन की मधुशाला

मधुवन की मधुशाला,
सब लिए फिरे मधुप्याला ,
फिरे मतंग छलकाते प्याला ,
वह रे मधुवन की मधुशाला,

मधु के भी खेल निराले ,
तोड़ दिए सरे बंधन ताले ,
पंडित पादरी और वो काजी ,
मधुशाला के सब मधुसाथी ,

मधुशाला की मधुकुंज में ,
सभी दिखे एक पुंज में ,
 फिरे लिए सब मधुप्याला,
 वह रे मधुवन की मधुशाला,