Saturday, May 9, 2015

माँ

माँ खुद पसीनें से तरबतर
पर मुझ पर पंखा डुलाते देखा है
खुद जग कर
मुझको सुलाता देखा है

खुद भूखा रह कर
मुझको खिलाते देखा है
पूँछने पर,पेट भरे होने का
बहाना करते देखा है।

मेरे दर्द में होने पर
माँ को रोते देखा है
मेरी सफलताओ में
उनकी आँखो को चमकते देखा है

मेरे घर देर आने पर
उनकी आँखो में इंतज़ार देखा है
मेरे न खाने पर
रात को जगाकर खिलते देखा है





Wednesday, April 15, 2015

अनजान रिश्ते

कितनी अज़ीब है
यह दुनियां
कितने अनजान रिश्ते
बनते  यहाँ
अपनों से बढ़कर
कभी कभी लोग
लगते यहाँ
दिल के रिश्ते कितनो से
जुड़ते यहाँ
न जान है  न पहचान है
पर लोग मिलते यहाँ
अपने हर लम्हे को
लोग लिखते  यहाँ
साथ में हँसते
साथ में रोते यहाँ  (आशु)

Thursday, March 5, 2015

होरी

रंग - वंग हो भंग संग में,
छोटा-बड़ा सब एक रंग में,
रंगो तनो और मनो रंगो,
नाचे सब एक संग में,

बड़े प्रेम से प्रेमी मिले,
रंगो के इस रंग-मंच में,
रंग-वंग हो भंग संग में,
रंगे हुए सब एक रंग में,

मीठा-सीठा खट्टा-वट्टा,
भूल गए सब रंग-वंग में,
ढूढ़ रही वो अपना प्रीतम,
पर रंगे हुए सब एक रंग में,

भंग पिये मतंग फिरे,
रंगो के इस रंग मंच में,
और पिये जा, और लिये जा,
रंगों के इस रंगा-रंग में,
होरी के प्रेम मिलन में।

Tuesday, March 3, 2015

होली

रंगो के इस रंगा रंग मे,
प्रेम मिलन के इस रंग मंच मे,
जाति धर्म सब लग गए किनारे,
एक रंग मे रंगे है सारे,

पीला नीला हरा गुलाबी,
बने हुए सब एक नयी प्रजाती,
प्रेम के रंग मे सभी रंगे,
रंगों के इस रंग मंच मे,

गोरा बन गया कितना काला,
काला लग रहा और निराला,
पकड़ पकड़ कर सभी रंगे गये,
होली के इस रंगा रंग मे,
प्रेम के इस प्रेम मिलन मे।

Thursday, February 5, 2015

ख्वाइश

देखा है कितनो ने मंजिलो की,
दौड़ में अपनों को छोड़ दिया,
हमसे भी कहते है,
जाओ कुछ कर दिखाओ,
अपनों से थोड़ा दूर हो जाओ,
नहीं तो कुछ नहीं कर पाओगें,
जहाँ जो वहाँ पर रह जाओगे,

अगर अपनों को खोकर,
जहाँ पा लिया तो क्या फायदा,
दो मृदु जल के कुँए खोकर,
समंदर पा लिया तो क्या फायदा,

हम भी उठेगें
बस अभी ठानी नहीं है,
इसका मतलब यह नहीं ,
की हमारे सपनों
की कोई कहानी नही है,

पढ़ लेना जब इतिहास के,
पन्नों में लिखी जाये क़ामयाबी मेरी,
देख लेना जब तुंम्हारे ,
बच्चों के सेल्बेस मे आये  कहानी मेरी,(आशु)

Monday, January 26, 2015

मौन

मौन

न शब्द लिखा
न अर्थ लिखा
मै मौन रहा,
लेखनी भी मौन रही,

शहीद हुए है जो रण मे,
उनको श्रद्धा ही लिखता रहा,
न अश्रु भरे हमने आँखो मे,
न ह्दय भरा हमने करुणा सें,

बस गर्व हुआ ,
मुझे उन माओ  पर,
जिसने शहीदो कों जन्म दिया,

गर्व हुआ,
अपने भारत पर,
जहाँ शहीदों ने,
जन्म् लिया,

न शब्द लिखा
न अर्थ लिखा

बस घृणा हुई,
मुझे अपने से,
मै देश के काम ,
ना आ पाया,

मै मौन रहा,
मै मौन रहा

Sunday, December 28, 2014

पाखी..


               पाखी....






एक पाखी,
मेरी साकी बन गयी,
पंख फैलाकर नभ् मे गुम गयी,
काश हम भी ,पाखी होते,
पंख फैलाते,गुम हो जाते ।

न बंधन कोई ,
न चिंतन कोई,
इस नव जीवन की,
तरणी मे,
मै शून्य यात्रा कर लेता,

मै नाहर बन,
गिरराज वक्ष मे,
अपना गेह बना लेता,
मै मेघ तुरंग बन,
अंचला की,
सात प्रकिमा कर लेता,

अपनी अभीष्ट पूर्ति कर,
हाला का भोग लगा लेता,
इस नव जीवन के,
अतुल्य मधु को,
आज यहाँ पर चख लेता,

अपने लोचन मे ,
लोक बसा ,
देवलोक यात्रा कर लेता,
पीर ,मद सब त्याग,
हिमकर मे धाम बसा लेता,

नीलकंठ के चरणों मे,
हलाहल भोग लगा देता,
मेघ मतंग बन,
आज सूर्य को मै ढक लेता,
चपला को वाहन बना
सुरपति से आज मै मिल लेता,

पंख फैलता ,
फिर उड़ जाता,
अर्श के उस अनंत तिमिर मे,